19 January 2024

raman maharishi


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अहं ही आकार ग्रहण करता है तो अहंकार बनता है।आकार सत्य नहीं है आकार प्रकृति और पुरुष का संयोग है। अहंकार विभाव है। अहंकार का कारण अविद्या है। अहंकार के कारण आत्मा पर आवरण पड़ गया है और अहंकार मन बुद्धि चित्त के भूल-भुलैया में फंस गया है। अहंकार को अपने स्वरूप का बोध होता है तो मन बुद्धि चित्त के साथ अहंकार अपने स्वरूप आत्मा में विलीन हो जाता है।

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ब्रह्म के संदर्भ में ऋषि मुनि का विचार है कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या। श्रृष्टि के आरम्भ में ब्रह्म ने संकल्प लिया

## एकोअहं बहुश्याम ## मन विचार करते गया श्रृष्टि हो गई।

सबसे पहले प्रकृति (पंच महाभूत) बना चेतन (पुरुष) बना। आदिगुरु शंकराचार्य जी का अद्वैत दर्शन पढ़ें। इंसान को पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियां मन बुद्धि चित्त अहंकार मिला। आरम्भ में विचार शुद्ध रहा इसलिए सतयुग रहा मानसिकता संकीर्ण होता गया तो त्रेतायुग द्वापरयुग अंत में कलयुग आ गया। इंसान इंद्रियों से संसार का अनुभव करता है और कर्म करता है। दैनिक जीवन में जो कर्म करते हैं वह प्रारब्ध कर्म है व्यवहार करते समय मन में दुसरे के लिए राग द्वेष मोह-माया का भावना पैदा होता है यह अगले जन्म के लिए इंसान का कर्म बंधन बनता है इसे पूरा करने के लिए नया शरीर मिलता है। मौन साधना करने पर पता चलता है कि आप चुप रहना चाहते हैं परंतु मन में लगातार विचार आ रहें हैं। ऐसा अनुभव होने पर विश्वास कीजिए कि आप मन नहीं हैं क्योंकि आफ चुपचाप रहना चाहते हैं परंतु मन में विचार आता रहता है।इसी तरह आप महसूस करेंगे कि आप गुस्सा नहीं करना चाहते हैं परंतु आपका गुस्सा आपके नियंत्रण से बाहर निकल आता है।इसी तरह आप अपने अहंकार को भी महसूस करेंगे। विपरित परिस्थितियों में आप शांत रहना चाहते हैं परंतु अहंकार आपको उत्तेजित करता है।समझ लें आप मन बुद्धि चित्त अहंकार नहीं हैं। फिर आप हैं कौन?आप अपने मन बुद्धि चित्त अहंकार विचारों का दृष्टा हैं , आप ब्रह्म हैं जो प्राणवायु मिलते रहने तक जड़ शरीर को जीवित रखता है शरीर में मन बुद्धि चित्त अहंकार को प्रकाशित करता है विषयों को प्रकाशित करता है तभी आप उजाले में संसार में व्यवहार करते हैं। आपका स्वरूप नाम रूप शरीर नहीं है, आप अहंकार को प्रकाशित करने वाले हैं आप अहंकार से भिन्न हैं आप ब्रह्म हैं। मौन साधना कीजिए मन बुद्धि चित्त अहंकार का दृष्टा बनिए।

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