आदि महादेव भगवान् शिव के पूजन महत्व सम्बन्धी अति गूढ़ नियम–
भगवान् शिव की पूजा से व्यक्ति को योग, ज्ञान, यश आदि की प्राप्ति होती है ('योगो ज्ञानं यशः सिद्धिर्महादेवादवाप्यते।' वीरमित्रोदय: पूजाप्रकाश पृ. 5) भगवान् शिव की पूजा प्रणव (ॐकार), रुद्रगायत्री, ईशान आदि पाँच मन्त्रों, त्र्यम्बकमन्त्र या पंचाक्षरमन्त्र अथवा किसी भी नाममन्त्र से की जा सकती है। कहा गया है कि-
पञ्चाक्षरेण मन्त्रेण पत्रं पुष्पं फलं जलम्।
यः प्रयच्छति शर्वाय तदनन्तफलं स्मृतम् ।।
अर्थात् पंचाक्षरमन्त्र द्वारा भगवान् शिव को पत्र, पुष्प, फल और जल समर्पित करनेवाला अनन्त फल को प्राप्त करता है। अगर लिंगरूप में भगवान् शिव की पूजा की जाती है तो उसका महान् फल होता है (शिवपूजा लिङ्गे महाफला वीरमित्रोदयः पू. प्र. पृ. 9)। लिंग दो तरह का होता है पार्थिव एवं स्थापित।
लिंगपूजा की महिमा का गान अनेक ग्रन्थों ने किया है। लिंगपूजा की विशेषताओं से संबंधित कुछ शास्त्रीय वचनों की उल्लेख इस प्रकार है-
लिङ्गे देवो महादेवः सर्वदेवनमस्कृतः ।
अनुग्रहाय लोकानां तस्मान्नित्यं प्रपूजयेत्।।
यो न पूजयते भक्त्या लिङ्गं त्रिभुवनेश्वरम् ।
न स स्वर्गस्य लोकस्य मोक्षस्य न च भाजनम्।।
यस्तु पूजयते नित्यं शिवं त्रिभुवनेश्वरम् ।
स स्वर्गराज्यमोक्षाणां क्षिप्रं भवति भाजनम् ।।
वरं प्राणपरित्यागः शिरसो वापि कर्त्तनम् ।
न त्वसम्पूज्य भुञ्जीत भगवन्तं त्रिलोचनम् ।।
न हि लिङ्गार्चनात् किचित् पुण्यमभ्यधिक क्वचित ।
इति विज्ञाय यत्नेन पूजनीयः सदा शिवः ।।
लिङ्गे तु पूजिते सर्वमर्चितं स्याच्चराचरम् ।
तस्मात्सदार्थनं कार्य लिङ्गस्य सुमहात्मनः।।
(वी. मि. पू. प्र. पृ. 196-197 में भविष्यपुराण एवं लिंगपुराण का वचन) ऊपर के श्लोकों का भावार्थ यह है कि लिंग में सभी देवों का निवास होने से लिंग को नमस्कार करने से सभी देवों को नमस्कार कर लिया जाता है जो लोग भक्तिपूर्वक भगवान् शिव के लिंग की पूजा नहीं करते उन्हें न तो स्वर्ग और न ही मोक्ष प्राप्त होता है। जो लोग नित्य शिवजी की पूजा करते हैं उन्हें शीघ्र ही स्वर्ग एवं मोक्ष प्राप्त हो जाता है। बिना शिव की पूजा के भोजन ग्रहण करने की अपेक्षा प्राण का त्याग कर देना श्रेष्ठ है। लिंगार्चन से अधिक पुण्य कुछ भी नहीं है- ऐसा समझकर यत्नपूर्वक सदाशिव की पूजा करनी चाहिये लिंगार्चन से समस्त चराचर की पूजा हो जाती है। इसलिये सत्पुरुषों को सदा लिंगार्चन करना चाहिये। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि-
मनसा चिन्तयेद्यस्तु पूजयामि हरं पदम् ।
अशक्तौ नास्ति चेद्रव्यं यस्य चापि सुमध्यमे ।।
स तया श्रद्धया पूतो विमुक्तः सर्वपातकैः ।
मम लोकमवाप्नोति भिन्नदेहो न संशयः
(वी. मि. पू. प्र. पू. 197)
अर्थात्- रोगादि के कारण अशक्त होने की स्थिति में अथवा गरीबी आदि के कारण द्रव्यों के अभाव में जो व्यक्ति भगवान् शिव की मानसिक रूप से पूजा करता है वह भी सभी पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है जो व्यक्ति भगवान शिव की भक्ति में तत्पर होकर प्रतिदिन लिङ्ग का पूजन करता है उसके सुमेरुतुल्य बड़े से बड़े पापों के समुदाय नष्ट हो जाते हैं-
यो लिङ्गं पूजयेन्नित्यं शिवभक्ति परायण:।
मेरुतुल्यपि तस्याशु पापराशिलयं व्रजेत ।।
(मन्त्रमहोदधि: 19 / 107)
भगवान् शिव की पूजा में चारों वर्गों का अधिकार है। पार्थिवलिंग की पूजा के बारे में कहागया है कि इसे स्त्री एवं शूद्र सभी स्वयं कर सकते हैं (स्त्रीशूद्रैश्च प्रकर्तव्यं पार्थिवे तु शिवेऽर्धनम् ) (वी. मि. पू. प्र. पू. 201)
यस्तु पूजयते लिङ्गं देवादिं मां जगत्पतिम् ।
बाह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा मत्परायणः ।
तस्य प्रीतः प्रदास्यामि शुभल्लोकाननुत्तमाम् ।।
(निर्णयसिन्धुः पू. 674)
उपर्युक्त श्लोक का भावार्थ यह है कि जगत्पति महादेवजी के लिंग की पूजा भक्तिपरायण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वा शूद्र जो कोई भी करता है उसे भगवान् शिव उत्तम लोक प्रदान करते हैं। शास्त्रों में पूजा के पाँच प्रकार बताये गये हैं- अभिगमन, उपादान, योग, स्वाध्याय और इज्या।
देवता के स्थान को साफ करना, लीपना, झाडू पोछा लगाना तथा निर्माल्य हटाना ये सब 'अभिगमन' के अन्तर्गत हैं। गंध, पुष्प आदि पूजा सामग्री का संग्रह 'उपादान' कहलाता है। इष्टदेव की आत्मरूप से भावना करना 'योग' है। मन्त्रार्थ का अनुसंधान करते हुए जप करना, का अभ्यास करना सूक्त, स्तोत्र आदि का पाठ करना, गुण, नाम, लीला आदि का कीर्तन करना और वेद शास्त्रादि ये सब 'स्वाध्याय' हैं। उपचारों के द्वारा अपने आराध्यदेव की पूजा 'इज्या' कही गयी है। ये पाँच प्रकार की पूजाएँ क्रमश: साटिं सामीप्य, सालोक्य, सायुज्य और सारूप्य मुक्ति देनेवाली हैं। इज्या के अन्तर्गत अभिगमन, उपादान एवं स्वाध्याय के अंश भी सम्मिलित हैं क्योंकि बिना देवप्रतिमा की सफाई किये एवं निर्माल्य हटाये इज्या नहीं हो सकती। इसी प्रकार बिना पूजा सामग्री जुटाये तथा जप एवं स्तोत्र के भी इज्या नहीं हो सकती। अतः इज्या के महत्त्व को देखते हुए यहाँ पर उपचारों द्वारा की जानेवाली शिवपूजा की चर्चा की जायगी
शिवपूजन के कुछ प्रमुख नियम–
किसी भी देव पूजन में मनुष्य को स्नान आदि से शुद्ध तो होना ही पड़ता है, यदि सम्भव हो और कठिनाई न हो तो पूजा करनेवाले को सिले हुए वस्त्र नहीं पहनना चाहिये। आसन शुद्ध होना चाहिये। पूजा के समय पूर्व या उत्तरमुख बैठना चाहिये। पूजा के प्रारंभ में उपयुक्त संकल्प किया जाना चाहिये शिव-पूजन के लिये कई और गूढ़ बातों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये जो निम्नवत हैं–
(1) भस्म, त्रिपुण्ड्र और रुद्राक्षमाला ये शिव-पूजन के लिये विशेष सामग्री हैं जो पूज के शरीर पर होनी चाहिये। अर्थात् शिवजी की पूजा त्रिपुण्ड्र भस्म एवं रुद्राक्ष की माला धारणकर करनी चाहिये।
विना भस्मत्रिपुण्ड्रेण विना रुद्राक्षमालया ।
पूजितोऽपि महादेवो न तस्य फलदो भवेत् ।।
( आचारेन्दुः पृ. 192)
विनाभस्मत्रिपुण्ड्रेणविनारुद्राक्षमालया ।
बिल्वपत्रविनानैवपूजयेच्च्छंकरं बुद्धः।।
(शिवपुराण विद्येश्वरसंहिता 21/55)
अर्थात् बिना भस्म, त्रिपुण्ड्र, रुद्राक्षमाला तथा बिल्वपत्र के भगवान् शिव की पूजा नहीं करनी चाहिये क्योंकि इन सबके बिना वह फलवती नहीं होगी। किसी यज्ञकुण्ड से ली गयी भस्म का त्रिपुण्ड्र उत्तम माना जाता है। अग्निहोत्र से ली गयी भस्म भी श्रेष्ठ है। किसी भी साधु की धूनी से ली गयी भस्म उपयोग में आ सकती है। यदि इनमें से कोई भी भस्म न मिल सके तो बिना व्यायी गाय के सूखे गोबर को जलाकर उसके भस्म को काम में लेना चाहिये।
पीपल की छाल को जलाकर उसके भस्म को गाय के दूध में सानकर पिण्डाकार बनाने के पश्चात् पुनः जलाया जाता है। फिर यह क्रिया कुछ अधिक बार दुहराई जाती है। इस प्रकार यह भस्म बहुत कोमल हो जाती है। नाथ सम्प्रदाय में इस भस्म को शरीर में लगाने की बहुत प्रथा है।
(2) भगवान् शंकर की पूजा में चम्पा या केतकी आदि का पुष्प नहीं चढ़ाया जाता।
(3) शिव की पूजा में भी दूर्वा एवं तुलसी दल चढ़ाया जाता है- इसमें सन्देह नहीं किया जाना चाहिये अवश्य ही तुलसी की मंजरियों से पूजा अधिक श्रेष्ठ मानी जाती है।
(4) शंकरजी के लिये विशेष पुष्प और पत्र में बिल्व पत्र प्रधान है, किन्तु बिल्व पत्र में चक्र और वज्र नहीं होना चाहिये। बिल्व पत्र में कीड़ों के द्वारा बनाया हुआ जो सफेद चिन्ह होता है उसे चक्र कहते हैं। बिल्व- डण्ठल की ओर जो थोड़ा सा मोटा भाग होता है वह वज्र कहा जाता है। वह भाग तोड़ देना चाहिये। कीड़ों से खाया हुआ तथा कटा- फटा बिल्व पत्र भी शिव पूजा के योग्य नहीं होता। आक का फूल और धतूरे का फल भी शिव पूजा की विशेष समग्री हैं, किन्तु सर्वश्रेष्ठ पुष्प है नीलकमल का। उसके अभाव में कोई भी कमल का पुष्प भगवान् शंकर को बहुत प्रिय है। कुमुदिनी पुष्प अथवा कमलिनी पुष्प का प्रयोग भी शिव पूजा में होता है बिल्व पत्र चढ़ाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि बिल्व पत्र का चिकना भाग लिंग- मूर्ति की ओर रहे।
(16) शिवपूजा में सूतक एवं पातक का दोष नहीं होता जबकि विष्णु आदि देवों की पूजा में यह दोष होता है। (आचारेन्दुः पृ. 235) सूतके मरणे चैव न दोषः परिकीर्तितः ।
(आचारेन्दुः पृ. 235)
(17) पूजा, जप अथवा होम के निमित्त हाथ में फूल, फल, जल, समिधा, कुशादि लेकर जाते समय व्यक्ति स्वयं किसी को न तो प्रणाम करे न हि किसी को आशीर्वाद दे क्योंकि करने से उपर्युक्त सभी वस्तुयें उन दोनों का निर्माल्य हो जाती है। परंत आध्यात्मिक गुरु इस नियम का अपवाद है। क्योंकि प्रकार मन्त्र को शब्दों का समूह तथा देवता को पत्थर आदि की प्रतिमा नहीं माना जाता, उसी प्रकार गुरु को भी शरीरधारी मनुष्य नहीं माना जाता, वरन् उसे आदि शिव का ही रूप माना जाता है। (धर्मसिन्धुः पृ. 660 तथा आचारेन्दुः पृ. 164)
(18) मन्दिर में चमड़े की सामग्री जैसे बेल्ट, पर्स, थैला या कोई पात्र आदि नहीं ले जाना चाहिये। परन्तु चमड़े के वाद्ययन्त्र जैसे ढोलक, मृदंग, नगाड़ा, डमरू आदि को ले जाया जा सकता है।
(19) शराब आदि निषिद्ध मादक द्रव्यों का सेवन कर नशे की स्थिति में व्यक्ति को मंदिर में न तो प्रवेश करना चाहिये और न ही पूजा करनी चाहिये। (वीरमि. पू. प्र. पृ. 184)
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